भोपाल: राजधानी भोपाल में मुहर्रम से पहले ईरान के झंडों और पोस्टरों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 6 के पास स्थित एक ईरानी डेरे में ईरान के झंडे और वहां के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत अन्य सैन्य नेताओं के बड़े-बड़े पोस्टर लगाए गए हैं। घटना सामने आते ही प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है, वहीं राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज़ हो गई है।
ईरानी डेरे में फ्लैग और पोस्टरों की भरमार
जानकारी के अनुसार, भोपाल रेलवे स्टेशन के पास स्थित एक ईरानी डेरे को पूरी तरह से ईरान के झंडों और पोस्टरों से ढक दिया गया है। ओवरब्रिज और आसपास की सड़कों पर भी ईरान समर्थक बैनर लहराते देखे गए। माना जा रहा है कि यह गतिविधि ईरान और इज़राइल के बीच हाल ही में हुए संघर्ष के समर्थन में की गई है।
हिंदू संगठनों का विरोध: “भारत में रहकर ईरान का समर्थन क्यों?”
ईरान के झंडों और खामेनेई के पोस्टरों को लेकर हिंदू संगठनों ने नाराज़गी जताई है। संस्कृति बचाओ मंच के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी ने तीखा हमला करते हुए कहा, “जो मुसलमान भारत में रहते हैं, उन्हें भारत माता की जय कहने में दिक्कत होती है लेकिन ईरान का प्रचार करते हैं। अगर इतना ही प्रेम है ईरान से तो वहीं चले जाएं। भारत में रहना है तो भारतीय बनकर रहना होगा।”
बीजेपी का बयान: “राष्ट्र की संप्रभुता पर हमला बर्दाश्त नहीं”
भारतीय जनता पार्टी ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता अजय सिंह यादव ने कहा, “भारत में वही रहेगा जो भारत के लिए समर्पित होगा। इस तरह के झंडे और पोस्टर लगाना देश की संप्रभुता पर हमला है, जिसे किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है।”
मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रिया: “सिर्फ मुसलमानों को ही निशाना क्यों?”
इस पूरे विवाद पर मुस्लिम समुदाय ने भी प्रतिक्रिया दी है। ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड के अध्यक्ष काजी अनस अली ने कहा, “सिर्फ मुस्लिम देशों और इस्लाम को ही टारगेट क्यों किया जाता है? अमेरिका किसका दोस्त है, यह भी देखना चाहिए। जब ईरान-इज़राइल युद्ध हुआ, तब प्रधानमंत्री मोदी ने भी ईरान से बात की थी। इसलिए मुसलमानों को नफरत की राजनीति से दूर रखें।”
कांग्रेस ने कूटनीति पर दिया जोर
कांग्रेस ने इस मुद्दे पर संयम बरतने की अपील की है। पार्टी के प्रदेश महासचिव अमित शर्मा ने कहा, “इस तरह के विषयों को विदेश नीति और कूटनीति के नजरिए से देखना चाहिए। बीजेपी और अन्य संगठन दोहरी मानसिकता से काम कर रहे हैं। अगर मुस्लिम देशों से इतना परहेज़ है, तो फिर बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री को शरण क्यों दी गई थी?”